Wednesday, 29 June 2016

"गांधीजी कहते थे वो सच? या आप कहते है वह?".... प्रधानमंत्री जी को चिठ्ठी.

प्रति,
मा. नरेन्द्र मोदी जी,
प्रधान मन्त्री,
भारत सरकार

दिनांक 25 जून को आपके करकमलों से महाराष्ट्र के पुणे में स्मार्ट सिटी मिशन योजना का शुभारम्भ हुआ। आपने बताया कि शहरी करण संकट नहीं, मौक़ा है- उपयुक्त अवसर है
महात्मा गांधी जी कहा करते थे कि गाँव में चलो। आप कहते हैं शहरी करण संकट नहीं है। हम पसोपेश में पड गए कि आपका कहना सही मानें कि महात्मा गांधी का? गांधी जी का कहना था कि प्रकृति के शोषण करने से होने वाला विकास शाश्‍वत विकास नहीं हो सकता। कभी न कभी उसका विनाश ज़रूर होगा। शहरी करण के कारण आज ही पेट्रोल, डीज़ल, रॉकेल, कोयला जैसे संसाधनों का अमर्याद शोषण हो रहा है। हज़ारों नहीं, लाखों टन पेट्रोल, डीज़ल, रॉकेल, कोयला जलाया जा रहा है। गाँवों का विकास करने में इतना तो शोषण नहीं होगा।
जिस मात्रा में पेट्रोल, डीज़ल, रॉकेल, कोयला जल रहा है, उतनी ही मात्रा में कार्बन डाई ऑक्साईड बनता जा रहा है। उस कारण से बीमारियाँ फैल रही हैं। अस्पताल हर जगह पर खचाखच भरे हुए हैं, मरीज़ों को जगह मिलना दुश्‍वार हो गया है। तापमान बढता जा रहा है। कई स्थानों पर गर्मी में 50 डिग्री के ऊपर हो गया। प्राणिमात्र के जीवन को ख़तरा पैदा हो गया है। बढते तापमान के चलते हिमशिखरों की बर्फ़ पिघलती जा रही है। उसका नतीजा यह हुआ कि समुद्री पानी की सतह ऊपर उठने लगी है। समुद्री किनारों के शहरों को ख़तरा पैदा हो चला है। यह तो वैज्ञानिकों का मानना है। पर आप कहते हैं शहरी करण संकट नहीं, मौक़ा है- उपयुक्त अवसर है
शहरी करण के चलते दिन ब दिन बढती जा रही शहरों की जनसंख्या और उस बढती जनसंख्या की ज़रूरतें बढती ही जा रही हैं। पानी की समस्या विकराल हो चली है। कृषि प्रधान देश भारत में कृषि के पानी में कटौती हो रही है और शहरों की प्यास बुझाने में उसे लगाया जा रहा है। दूसरी ओर, बाँधों की कैचमेण्ट एरिया- जलग्रहण क्षेत्र में आवश्यक उपचार न होने के कारण खेतों की मिट्टी का बहाव बढता जा रहा है और यह मिट्टी बडे बाँधों में जा कर जमा हो रही है। हर साल बारिश के मौसम में बहते पानी के साथ हज़ारों टन मिट्टी (खेतों की टॉपसॉयल) बहती हुई बाँधों में जा पहुंचती है। सभी बाँधों की तलछटी में साद जमा हो चुकी है। परिणामत: बाँधों की जलसंग्रह क्षमता भारी मात्रा में कम हो चली है। यह संकट बहुत बडा है। डैम मिट्टी से भरते जा रहे हैं। इस समस्या की विकरालता इस क़दर है कि डैम का बैक वॉटर 60/70/80 किमी तक फैला हुआ तथा डैम की ऊंचाई 250/300 मीटर होती है। इतने विशाल क्षेत्र के तले मिट्टी जम चुकी है। यह तो जैसे मिट्टी की पहाडी है। कौन उसे निकाल पाएगा? न यह सरकार के बस का काम है न ही जनता के।
इन्सान को मरना पसन्द नहीं है, फिर भी आयु पूरी होने पर मृत्यु हो ही जाती है। ठीक उसी तरह हमारे न चाहने पर भी मिट्टी से भरते जा रहे इन बाँधों की मृत्यु को कौन रोक सकता है? शायद हमारे जीवन काल में यह न भी हो, पर क्या आने वाली पीढियों के लिए हम इस संकट को छोड जाएं?
प्रकृति से जो भी संसाधन हम लेते जा रहे हैं, उनकी भी आख़िर कोई सीमा है। एक-एक कर सभी संसाधन ख़त्म होते जाएंगे। फिर संकट गहराता जाएगा।
 इसी लिए गांधी जी कहते थे, विकास का केन्द्र बिन्दु गाँव हो। गाँव में गिरने वाली बारिश के पानी को और पानी के साथ बहती मिट्टी को गाँव ही में रोक लो। ता कि वह गाँव ही में रहे, बह कर बाँध में न जाए। इसके कारण गाँव का भूजल स्तर ऊपर उठेगा। कृषि विकास होगा। गाँव के रहने वालों को गाँव के गाँव में  खेती में काम मिल जाएगा। फिर उनको शहर में जाने की नौबत ही नहीं होगी। न सरकार के सामने बेरोज़गारी की समस्या रहेगी। न ही प्रकृति का शोषण होगा। गाँव के लोग स्वयम्पूर्ण होंगे, आत्म-निर्भर होंगे। गाँव की अर्थ व्यवस्था मज़बूत होगी। देश की अर्थ व्यवस्था को मज़बूत करने के लिए गाँव की अर्थ व्यवस्था को सुधारना ज़रूरी है, ऐसा महात्मा जी का मानना था। आज़ादी के 68 वर्षों में हम देश वासी अनुभव कर चुके हैं कि शहरों की अर्थ व्यवस्था के बदलने से देश की अर्थ व्यवस्था नहीं सुधरेगी।
गांधी जी कहते थे कि देश को बदलना है तो पहले गाँव को बदलो। आप कहते हैं कि स्मार्ट सिटी बनानी है। भारत वासी उलझन में हैं कि आपको सही मानें कि महात्मा गांधी को?
हम जैसे कुछ लोगों ने महात्मा गांधी जी के विचारों पर आधारित कुछ प्रयोग कर देखे हैं। जिस गाँव की 80 प्रतिशत जनसंख्या को आधे पेट खाना नसीब था, वहीं से करोडों रुपयों की लागत में साग-सब्ज़ी, प्याज़ बिकने जा रहा है। अकाल के बावजूद गाँव में से 5000 लीटर दूध का संकलन रोज़ हो रहा है। गाँव के युवाओं को गाँव ही में काम मिला है और बाहर जा कर नौकरी की जो तनखा मिलनी थी उससे ज़्यादा पैसा गाँव ही में मिल रहा है। उन दिनों जब गाँव में काम न मिलने पर 5/10 किमी. दूर पर जा कर रोज़ काम करना पडता था वहाँ आज मज़दूर न मिलने से बाहर के परिवार मज़दूरी करने आते हैं। गाँव में से जाति-पाँति के भेदभाव को मिटा दिया गया है। 2500 की जनसंख्या वाला यह गाँव एक परिवार बन के रहता है।
हमारा देश गाँवों में बसा है, गाँव का सर्वांगीण विकास ही देश का विकास होगा ऐसा गांधी जी कहते थे।
मैं जानता हूं कि मेरे पत्रों का जवाब आप नहीं देते हैं, फिर भी आपको पत्र लिख रहा हूं। यह देश किसी व्यक्ति, पक्ष, पार्टी विशेष का नहीं है। देश का हर नागरिक इसका मालिक है। सेवक कहलाने वालों को खरी-खोटी कहने का अधिकार उसे प्राप्त है।
इसी लिए 30 वर्ष आन्दोलनों के माध्यम से देश वासियों को जगाने का प्रयास किया है और करते रहूंगा। आप स्मार्ट सिटी में दिलचस्पी रखते हैं, कुछ दिलचस्पी लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त की नियुक्ति में रखते तो अच्छा होता। 2 साल हो गए फिर भी आज भी आम नागरिक को भ्रष्टाचार से राहत नहीं मिली। बिना पैसे दिए काम नहीं होता यह हक़ीक़त है। इसी कारण लोकपाल-लोकायुक्त कानून बने हैं, उनको अमल में लाना ज़रूरी है।
पूरी ज़िन्दगी में मैंने कभी बैंक बैलेन्स नहीं बनाया। खाने की थाली और सोने के बिस्तर के अलावा कोई जमाखोरी नहीं की। एक ही संकल्प को ले कर जी रहा हूं कि जब तक जीना है वह गाँव, समाज और देश की सेवा के लिए जीना है और मरना भी उसी के लिए। इस व्रत के कारण जब समाज और देश के हित में बाधा पहुंचाने वाली बात होती है तो मन व्याकुल हो उठता है। शहरी करण को उपयुक्त अवसर मानने वाली आपकी बात को ले कर मन में खलबली पैदा हुई इस कारण पत्र लिख बैठा हूं।
सन 1857 से 1947 के 90 सालों में लाखों लोगों ने कुर्बानी दी, फिर भी आज देश में लोगों का, लोगों ने, लोक सहभागिता से चलाया हुआ लोकतन्त्र नहीं आया। क्या उन वीरों का बलिदान व्यर्थ गया? कई बार आपने भी कहा कि सत्ता का विकेन्द्री करण हो कर जब तक लोगों के हाथ में सत्ता नहीं आएगी तब तक देश में सही लोकतन्त्र नहीं आएगा। आपने कहा ज़रूर मगर करते नहीं यह लोगों के मन की बात है।
सच बोलने पर कभी सगी माँ तक गुस्सा हो जाती है। समाज और देश के हित में सच सच कहते रहता हूं। सम्भव है आप भी गुस्सा हुए होंगे, तभी तो पत्र का जवाब नहीं देते हैं। यद्यपि मैं नहीं मानता कि पत्र लिख कर मैं कोई गलती कर रहा हूं, फिर भी यदि आप ऐसा सोचते होंगे तो क्षमाप्रार्थी हूं। 
सधन्यवाद,
भवदीय, 
कि. बा. तथा अन्ना हजारे

Thursday, 31 December 2015

प्रधानमंत्री मा. नरेंद्र मोदीजी को चिठ्ठी...

दि. 01/01/2016
जा.क्र. भ्रविज- 46/2015-16


प्रति,
मा. नरेंद्र मोदी जी,
प्रधान मंत्री, भारत सरकार,
राईसीना हिल, नई दिल्ली

विषय- भ्रष्टाचार को कुछ हद तक रोकने के लिए लोकपाल और लोकायुक्त कानून का अमल करने हेतु और किसानों की खेती पैदावार के लिए सही दाम मिले इस बारे में...

महोदय,
सस्नेह वन्दे।
      कॉंग्रेस की सरकार में भ्रष्टाचार बढ गया था। अपने काम के लिए किसी भी दफ़्तर में गए तो बिना पैसा दिए जनता का काम ही नहीं हो रहा था। बढते भ्रष्टाचार के कारण महंगाई भी बढ गई थी। देश की जनता भ्रष्टाचार से त्रस्त हो गई थी। ग्राम-विकास किये बिना और भ्रष्टाचार को रोके बिना समाज और देश को उज्वल भविष्य नहीं मिलेगा, ऐसा सोच कर विगत तीस सालों से मैं ग्रामविकास कार्य के साथ भ्रष्टाचार को रोकने के लिए आंदोलन करते आया हूँ। मुझ जैसा एक फकीर आदमी, जिसके पास ना धन, ना दौलत, ना सत्ता, ना पैसा है, सिर्फ सोने का बिस्तर और खाने के लिए प्लेट है। लेकिन भ्रष्टाचार रोकने के लिए लोकपाल और लोकायुक्त कानून बने इस हेतु दिल्ली में रामलीला मैदान में 16 अगस्त से 28 अगस्त तक 13 दिन तक मैं अनशन पर बैठा था।

देश के बढते भ्रष्टाचार को रोकना जरूरी है। यह जनता की मन से इच्छा थी। जनता भ्रष्टाचार से बाज आ गई थी। इस लिए पूरे देश की जनता आंदोलन के लिए खडी हो गई थी। खास तौर पर युवा शक्ति बडे पैमाने में रास्ते पर उतर आई थी। देश के हर राज्य में, जिला, तहसिल, गांव स्तर पर यह आंदोलन फैल गया था। आजादी के बाद पहली बार देश में इतना बडा आंदोलन जनता ने किया था।
      बढते भ्रष्टाचार के कारण देश की जनता उस सरकार पर नाराज हो गई थी। ऐसी स्थिति में जब देश में अप्रील-मई 2014 में लोकसभा का चुनाव आ गया, और आपने जनता को आश्वासन दिया कि, हमारी पार्टी सत्ता में आती है तो, हम भ्रष्टाचार के विरोध की लडाई को प्राथमिकता देंगे। जनता ने आपके शब्दों पर विश्वास किया कि, आपकी सरकार सत्ता में आने पर भ्रष्टाचार मुक्त भारत निर्माण होगा। लेकिन आज भी कहीं पर भी अपने काम के लिए जाने पर बिना पैसा दिए जनता का काम नहीं होता है। न ही महंगाई कम हुई है। उस सरकार और आपकी सरकार में विशेष तौर पर भ्रष्टाचार के बारे में कोई फर्क दिखाई नही देता है। जब आप लोकसभा में पहली बार जा रहे थे तब लोकसभा की सीढियों पर नमन करते हुए आपने देशवासियों से कहा था कि, मैं लोकसभा के एक पवित्र मंदिर में प्रवेश कर रहा हूँ, उस मंदिर को पवित्र रखने का प्रयास करुंगा। लेकिन ऐसा चित्र कहीं भी नजर नहीं आ रहा है। लोकसभा का पूरा का पूरा सत्र झगडे-टण्टे में जा रहा है। जनता का करोडों रुपया बर्बाद हो रहा है।
      आपने जनता को यह भी आश्वासन दिया था कि, हमारे देश का काला धन जो विदेशों में छुपा है, उसको हमारी पार्टी के सत्ता में आने पर 100 दिन के अन्दर देश में वापिस लायेंगे और हर व्यक्ति के बँक अकाउँट में पंधरा लाख रुपया जमा करेंगे। उस से देश का भ्रष्टाचार कम होगा। लेकिन आज तक किसी व्यक्ती के बँक अकाउँट में 15 लाख तो क्या 15 रुपया भी जमा नहीं हुआ है।
आप की सरकार को सत्ता में आ कर डेढ साल से ज़्यादा समय हो चुका है। लेकिन भ्रष्टाचार को रोकने के लिए जो लोकपाल और लोकायुक्त कानून बना है, उस पर न तो आप कुछ बोलते हैं और न ही उस पर अमल करते हैं। हम उम्मीद लगाये हुए थे कि मन की बात में कभी लोकपाल और लोकायुक्त के विषय पर आप कुछ ना कुछ बोलेंगे। क्यों कि भ्रष्टाचार के विरोध की लडाई को प्राथमिकता देने की बात देश की जनता से आपने जो कही थी।
      हो सकता है, उन बातों का शायद आपको विस्मरण हो गया हो, इसलिए आपको फिर से याद दिलाने के लिए यह पत्र लिख रहा हूँ। मुझे यह पता है कि, आज तक आपको लिखे मेरे कई पत्र आपकी कचरे की टोकरी में डल चुके हैं। इस पत्र की भी शायद वही गति होने वाली है, फिर भी समाज और देश की भलाई के लिए मेरी कोशिश जारी रहेगी। देश की जनता ने करोडों की संख्या में लोकपाल और लोकायुक्त के लिए देश में आंदोलन किया था। आश्वासन दे कर उस पर  अमल नहीं करना यह, मैं मानता हूं, जिन देशवासियों ने इतना बडा आंदोलन किया था उनका अवमान है।
जैसा कि, आप अपने आपको प्रधान सेवक मानते हैं, और वास्तविकता में यह सही भी है कि जनता इस देश की मालिक है। जनता की सनदका कानून बनवाने का आश्वासन न केवल तत्कालीन सरकार ने, बल्कि विरोधी दल के नाते आपके पार्टी के श्रीमती सुषमा स्वराज जी, मा. अरुण जेटली जी इन्होंने भी दिया था।
भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए और भी कई आश्वासन दिए थे। लेकिन उनकी आपूर्ति नहीं हुई है। कृषि-प्रधान भारत देश के किसानों को आप ने आश्वासन दिया था कि, किसान खेती में पैदावारी के लिए जो खर्चा करता है, उसका डेढ गुना मूल्य किसानों को अपनी खेती की पैदावारी से मिलेगा। लेकिन आज भी खेती माल को सही दाम ना मिलने के कारण देश का किसान आत्महत्या करने पर मजबूर है। सच बोलने पर तो सगी मॉं को भी गुस्सा आता है। मैं तो देश की जनता की भलाई के लिए और देश के उज्वल भविष्य, देश के विकास के लिए सच बोलते आया हूँ। इसी वजह से आपको भी शायद गुस्सा आता होगा और सम्भवत: इसी कारण मेरे पत्र आप कूडा दान में डालते होंगे।
एक प्रधान मंत्री नरसिंह राव जी, थे जो कभी-कभार फोन पर बातचीत किया करते थे। समाज और देश के भलाई की बात किया करते थे। मा. अटल बिहारी वाजपेयी जी कभी पुणे में आने पर जरूर पूछताछ किया करते थे। मुलाकात होने पर देश के विकास और खास कर ग्रामविकास की बातें करते थे। एक प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह जिनके विरोध में मैं खूब बोलता था, आंदोलन करता था। उनकी तरफ से भी मेरे पत्र का जवाब मिलता था। श्री. शेषाद्री जी जो आर.एस.एस. के जानेमाने नेता थे, उनका और मेरा कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं था लेकिन हमारा काम देखने वे रालेगण सिद्धी गांव में आए थे और एक कर्मयोगी का गांव नाम की छोटी किताब उन्होंने लिखी थी। कितने बडे मन के लोग थे।
मेरी यह बिलकुल अपेक्षा नहीं है कि मेरे पत्र का आप मुझे जवाब दें। मेरा हर कर्म निष्काम कर्म है। मुझे आपसे न कुछ लेना न ही कुछ मांगना है। मेरी 25 साल की उम्र में मैने व्रत ले लिया कि जब तक जीऊंगा तब तक मेरा गांव, समाज और देश की सेवा करूँगा। और जिस दिन मैं मरूँगा, देश की सेवा करते मरूँगा। देश और देश की जनता की भलाई के लिए जनता की ओर से जो पत्र आप के पास आते हैं, मैं मानता हूं कि देश के प्रधान सेवक होने के नाते आपने उनका जवाब देना जरुरी है। यह भी मैं समझ सकता हूं कि, देश की जनता में से हर एक को जवाब देना आपके लिए सम्भव नहीं है। लेकिन समाज और देश के भलाई के लिए समर्पित भाव से देश में कार्य करने वाले कार्यकर्ता को पत्र का जवाब मिलना चाहिए। आपके जवाब न देने से ऐसे कार्यकर्ताओंं का कार्य रुकता तो नहीं है। वह चलते ही रहता है।
लम्बे अन्तराल के बाद मैंने लोकपाल और लोकायुक्त कानून पर अमल करने के लिए और किसानों के खेती माल के लिए सही दाम मिले ताकि किसान आत्महत्या ना करें, इन बातों की याद दिलाने के लिए पत्र लिखा है। सत्ता तो आखिर आपके हाथों में है। यूं लगता है कि सत्ता की भी एक नशा होती है। सत्ता के आगे मुझ जैसे एक फकीर आदमी का क्या बस चलेगा? किया तो आखिर कार वह आंदोलन ही कर सकता है, जो अधिकार संविधान ने हर नागरिक को दे रखा है।
नए साल की शुभकामनाएं। नए साल के अवसर पर हम सब एक साथ मिलकर भ्रष्टाचार मुक्त भारत निर्माण करने का संकल्प करे।

धन्यवाद।

भवदीय,

कि. बा. तथा अण्णा हजारे


Wednesday, 30 September 2015

निर्वाचन आयोग का लोकतांत्रिक और संवैधानिक फैसला

1 मई 2015 के बाद कराए जानेवाले सभी चुनाओं में बॅलेटींग युनिट पर प्रदर्शित किए जानेवाले मतपत्र/ ई.व्ही.एम. में अभ्यार्थीयों के (उम्मीदवारोंके) फोटो भी मुद्रीत होंगे। यह निर्वाचन आयोग का लोकतांत्रिक और संवैधानिक फैसला है।

·          जुलमी अंग्रेजों का अन्याय, अत्याचार सहन करने की क्षमता खत्म होने के कारण देश की जनताने1857 में आजादी की लढाई शुरु की।
·          1857 से 1947 इन नब्बे साल में शहीद भगतसिंग, सुखदेव, राजगुरु जैसे लाखो शहीदोने अपनी कुर्बानी दी।
·          1947 में देश आजाद हुआ। अंग्रेज हमारे देश से चला गया।
·          जिन लाखो शहीदो ने कुर्बानी दी उनका सपना था अंग्रेजों को देश से निकालना और देश मे लोकतंत्र को लाना । जो लोगोंका, लोगोने, लोकसहभाग से चलाया हुवा तंत्र वह लोकतंत्र ।
·          1947 में अंग्रेज हमारे देश से चला गया लेकिन देश मे जो लोकतंत्र आना था वह लोकतंत्र नहीं आया क्योंकि पक्ष और पार्टीतंत्र ने उसे आने ही नहीं दिया ।
·          1947 मे देश को आजादी मिली 1949 में भारतरत्न डॉ. बाबासाहेब आंबेडकरजी ने हमारा सुंदर संविधान बनाया । उस संविधान में पक्ष और पार्टी का नाम कही पर भी नही है ।
·          हमारा संविधान अनुच्छेद 84 के (क) और (ख) यह कहता है कि, भारत में रहनेवाला कोई भी भारतीय नागरिक उसकी उम्र 25 साल की हुई है ऐसे वैयक्तिक व्यक्ति लोकसभा का चुनाव लड सकता है ।
·          भारत में रहने वाला कोई भी व्यक्ति जिनकी उम्र 30 साल की हुई है वह कोई भी व्यक्ति राज्यसभा का चुनाव लड सकता है । संविधान पक्ष और पार्टी के समुह को चुनाव लडने की अनुमती नही देता है ।
·          26 जनवरी 1950 को हमारे देश में प्रजासत्ताक मनाया गया । जनता देश की मालिक बन गई। अब पक्ष और पार्टीयाँ बरखास्त होनी चाहिए थी क्योंकि संविधान में पक्ष और पार्टी का नाम ही नही है । इसलिए महात्मा गांधीजीने काँग्रेसवालोंको कहा था, जनता मालिक होने के कारण काँग्रेस पार्टी बरखास्त करो अब पार्टी का काम नही ।
·          1952 में देश में पहला चुनाव होनेवाला था उस  वक्त पक्ष और पार्टीयाँ बरखास्त तो हुई नहीं उलटा काँग्रेस पार्टी और बाकी पार्टीयों ने संविधान में पक्ष और पार्टी को चुनाव लडने की अनुमती ना होते हुए घटनाबाह्य चुनाव लडने का निर्णय लिया गया ।
·          यह चुनाव पक्ष और पार्टी का चुनाव संविधान विरोधी होने के कारण तत्कालिन चुनाव आयोगने इस पर आपत्ती उठाना जरुरी था लेकिन चुनाव आयोग ने आपत्ती ना उठाने के कारण 1952 से आज तक घटनाबाह्य चुनाव हो रहे है ।
·          घटनाबाह्य चुनाव के कारण पक्ष और पार्टीयों मे सत्ता स्पर्धा शुरु हो गई । हर पार्टी सोचने लगी येन-केन प्रकार से चुनकर आना है और सत्ता काबीज करनी है ।
·          चुनाव में सत्ता स्पर्धा के कारण कई पार्टीयाँ अपने पार्टी का उम्मीदवार गुंडा है, भ्रष्टाचारी है, लुटारु है, व्यभिचारी है यह पार्टी के लोग जानते है फिर भी ऐसे दागी उम्मीदवार को कई पक्ष-पार्टी ने चुनाव का तिकीट देना शुरु हो गया क्योंकि उनके पिछे मतोंका गठ्ठा है ।
·          इस कारण लोकसभा जैसे लोकशाही के पवित्र मंदिर में भ्रष्टाचारी, गुंडा, लुटारु उम्मीदवार चुनकर गए । लोकशाही के पवित्र मंदिर में आज 170 लोग दागी बैठे हुए है ।
·          पक्ष और पार्टी के समुह ने घटनाबाह्य चुनाव लडने के कारण संसद में पार्टीयोंका समुह बन गया और बाहर  समाज में भी पक्ष और पार्टीयों का समुह बन गया ।
·          पक्ष और पार्टीयों के समुह के कारण देश में भ्रष्टाचार बढते गया । समुह के कारण गुंडागर्दी बढ गई। दहशदवाद बढ गया। समुह के कारण लुट बढ गई। संविधान के मुताबीक जनताने चुना हुआ चारित्र्यशिल वैयक्तिक उम्मीदवार संसद में चुनकर जाता तो भ्रष्टाचार, गुंडागर्दी, दहशदवाद, लुट नही बढनी थी ।
·          हमारे देश में 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला, हेलिकॉप्टर घोटाला, कोयला घोटाला, व्यापम घोटाला जैसे करोडो रुपयों के घोटाले हुए है । यह पक्ष और पार्टीयों के समुह के कारण हुए है।
·          महात्मा गांधीजी कहते थे देश को बदलाना है तो पहले गावं को बदलना होगा । जबतक गावं नही बदलेंगे तब तक देश नही बदलेगा । आज देश के अधिकांश गावं में पक्ष और पार्टीयों के समुह ने गावं के लोगो में अपने -अपने पक्ष के ग्रृप बनाकर आपस में झगडे लगाए है । उस कारण अधिकांश गाव का विकास रुक गया ।
·          हमारे देश की लोकसभा यह लोगों की सभा होनी चाहिये ।  लोगोंकी सभा तब बननी थी जब संविधान के मुताबीक जनता का वैयक्तिक चारित्र्यशिल उम्मेदवार चुनकर जाता  तो वह लोगों की सभा बननी थी । लेकिन आज घटनाबाह्य पक्ष और पार्टी के लोग संसद में जाने के कारण वह लोगों की सभा ना बनते हुए पक्ष और पार्टी की सभा बन गई है ।
·          युवा शक्ती एक राष्ट्रशक्ती है । युवाशक्ती को जगाकर विधायक कार्य़ मे बढाते तो समाज, देश का उज्वल भविष्य दूर नही है । लेकिन पक्ष और पार्टीयों के समुह ने महाविद्यालयीन विद्यार्थीयों में अपने-अपने पक्ष-पार्टी के ग्रुप बनाने के कारण जो युवा शक्ती समाज और राष्ट्र विकास में लगनी थी वह य़ुवाशक्ती आपस में झगडे-तंटो में लगा दी है ।
·          आज उच्च शिक्षा में मेडिकल, इंजिनीयरींग, लॉ जैसे कही कॉलेज निकाले गए । अधिकांश कॉलेज पक्ष और पार्टीयों ने आपस में बटवारा कर के पैसों केलिए दुकानें लगाकर बैठे है । इस लिए सामान्य परिवार के छात्र उच्च-शिक्षा नही ले पाते ।
·          आझादी के 68 साल बित गये फिर भी हमें लोकतंत्र में सही सफलता नही मिली। उसका कारण है कई पक्ष और पार्टी के समुह अपने-अपने पक्ष-पार्टी की चिंता ज्यादा करते है । समाज और देश की चिंता करनी चाहिए वह नहीं होती है ।
·          पक्ष और पार्टी के इन समुह ने इकठ्ठा आ कर निर्णय लिया है कि पक्ष और पार्टी के चुनाव के लिए पैसा लगता है इसलिए पक्ष-पार्टी को (20,000/-) बीस हजार रुपयों का डोनेशन मिलता है तो उसका हिसाब जनता को नही देना है। कई पक्ष और पार्टीयाँ बडे-बडे उद्योगपतीयों से लाखो-करोड रुपयों का डोनेशन लेती है। उनके बीस हजार रुपयों के तुकडे बनाते है। उन तुकडो को बोगस नाम देते है और हमारे देश का कालाधन कई पक्ष-पार्टीयों के माध्यम से सफेद होता है। यह इस देश को बडा खतरा है ।
·          घटनाबाह्य चुनाव लडकर पक्ष और पार्टी के उम्मीदवार संसद में जनता के सेवक बनकर गए है । आज रहने के लिये बंगला, गाडी, टेलीफोन, बिजली, पाणी, एअर फेर, क्लास वन रेल, ए.सी. जैसे कई रियायत लेते है । उसके अलावा हर महा पचास हजार रुपया तनखा भी लेते है। फिर भी आज संसद में बैठे हुये पक्ष-पार्टी के कई लोग इकठ्ठा आ कर हमे पचास हजार रुपया तनखा पुरा नही होता है, एक लाख रुपये तनखा मिलने की मांग कर रहे है । जनता मालिक होने के कारण और जनप्रतिनिधी जनता के सेवक होने के कारण अपनी तनखा बढानी है तो जनता की राय लेना आवश्यक है। फिर भी अपनी मर्जी से जनता का पैसा आपस में बटवारा कर लेते है । यह बात लोकतंत्र के लिए  ठीक नही है।
·          जिस स्थिती में यह देश जा रहा है उस स्थीती में देश को उज्वल भविष्य मिलना संभव नही है । अगर देश को उज्वल भविष्य देना है तो उस की चाबी देश के जनता के हाथ में है ।
·          आने वाले दिनो में हर मतदार भारत माता की कसम ले कर प्रतिज्ञा करेगा की में कोई भी पक्ष और पार्टी का गुंडा, भ्रष्टाचारी, लुटारु, दहशतवादी उम्मीदवार जो घटनाबाह्य है ऐसे उम्मीदवार को मेरा वोट नही दूँगा। मैं सिर्फ जनता का वैयक्तिक चारित्र्यशिल उम्मीदवार है ऐसे उम्मीदवार को ही मेरा वोट दूँगा । सिर्फ पक्ष-पार्टी की सत्ता बदलकर देश में बदलाव नहीं आएगा। यह आजादी के 68 साल हम जनता ने अनुभव किया है। जब तक व्यवस्था परिवर्तन नहीं होगा तब तक देश को उज्वल भविष्य नही मिलेगा । पक्ष-पार्टी व्यवस्था परिवर्तन नही कर सकती यह आजादी के 68 साल से हम अनुभव कर रहै है। इसलिए जनता  के चारित्र्यशिल उम्मीदवार चुनकर गए तो व्यवस्था परिवर्तन कर पायेंगे ऐसा विश्वास होता है। कई लोग कहते है, संसद में पक्ष और पार्टी के उमेदवार नही होने से देश कैसा चलेगा? हमारा संविधान इतना अच्छा है कि जनता के उम्मीदवार को संविधान मार्गदर्शन करेगा । प्रधानमंत्री कैसे चुनना है? सभापती कैसे चुनना है? संसद मे स्टॅंडींग, ज्वाइंट कमीटी जैसी कमिटीया कैसी बनानी है? इन सभी बातों की जानकारी संविधान में दी गई है। उसके आधार से जनता के उम्मीदवार संसद को चला सकते है ।
·          अब आजादी की दुसरी लडाई देश के जनता को लडनी होगी। इस लडाई में जनता ने पक्ष और पार्टी के चुनाव चिन्ह जो घटनाबाह्य है उसको हटाना है और चारित्र्यशिल उम्मीदवार के फोटो के सामने का बटन दबाकर अपना वोट देना है। हर मतदाताने सिर्फ इतना करने से यह लडाई सफल हो जाएगी। इसलिए देश में समविचारी लोगों का संगठन बनाकर देश में आंदोलन खडा करना होगा।
पहले लडाई में जनता को नब्बे साल लडना पडा था क्योंकी अंग्रेज पराया था। उनको देश से निकालना कठीण था । इसलिये कई लोगों को शस्त्र से हिंसा भी करनी पडी थी । अब इस लडाई को इतना समय नही लगेगा। फिर भी 8, 10, 12 साल का समय लग सकता है। जनता कितने समय में कितनी संगठित होती है उस पर निर्भर है। पहले लडाई में लाखो लोगों ने बलिदान किया था। अब हमे बलिदान करने की जरुरत नही पडेगी क्योंकि हमारे देश के हमारे ही भाईयों के साथ अहिंसा के मार्ग से यह लढाई लडनी है । इस लडाई में अहिंसा के मार्ग से किसीसे भी झगडे-तंटे ना करते हुए सिर्फ अपने अमुल्य मत से मतपेटीयां और ई.व्ही.एम. से मतदार बदलाव ला सकेंगे । सिर्फ हर मतदारों ने भारत माँ की कसम ले कर प्रतिज्ञा करनी है कि मै किसी भी पक्ष-पार्टी के गुंडा, भ्रष्टाचारी, लुटारु, व्यभिचारी उम्मीदवार को मेरा अमुल्य मत नही दूँगा । मै संविधान के मुताबीक सिर्फ जनता का पक्ष-पार्टी विरहीत जो चारित्र्यशिल उम्मीदवार होगा ऐसे चारीत्र्यशिल उम्मेदवार को ही मेरा मत दूँगा । आनेवाले दस-बारा साल देश में गावं-गावं तक जागृती हो गई तो एक दिन ऐसा आयेगा की देश में लोगोंका, लोगोने, लोकसहभाग से चलाया हुआ जनतंत्र (लोकतंत्र) आयेगा । देश में हर राज्य में गाव स्तर पर लोकशिक्षण, लोकजागृती के कार्य करनेवाले कार्यकर्ताओं का संगठन करने का प्रयास होना जरुरी है। ऐसा प्रयास करनेवाले कार्यकर्ता आगे आ कर संगठित होकर प्रयास करना होगा ।
निर्वाचन आयोग द्वारा एक अच्छा निर्णय लिया गया है, एक मई 2015 के बाद कराये जानेवाले सभी निर्वाचनों में इव्हीएम के बॅलेट युनिट पर प्रदर्शित किए जानेवाले मतपत्र तथा डाक मतपत्र में विद्यमान निर्देश के अनुसार विवरों के अतिरिक्त इस पर उम्मीदवारों के फोटो भी मुद्रित होंगे। उम्मीदवारों के नाम तथा प्रतीक (आकृति) के मध्य में नाम के दाहिने ओर मत प्राथमिकता चिन्हित करने के कॉलम होंगे। ऐसा चुनाव आयोग ने 1 मई 2015 को निर्णय लिया है।  
अब हम देश की जनता इकठ्ठा हो कर चुनाव आयोग से बिनती करनी है की, आप ने मतपत्र में इव्हिएम पर प्रत्योशियों के फोटो लगाना सुनिश्चित किया है। यह लोकतांत्रिक और संविधानिक फैसला है। लेकिन अब किसी फोटो के साथ प्रतीक (चुनाव चिन्ह) की जरुरत नहीं रह जाती है। ऐसा चिन्ह रखना घटनाबाह्य होगा। हम सभी जनता ने मतपत्र/इव्हिएम पर से चुनाव चिन्ह को हटाने का आग्रह करना होगा। क्यों की ऐसा चिन्ह घटनाबाह्य है। अगर चुनाव चिन्ह हट जाए तो देश में लोकतंत्र आना आसान होगा। चलो, चुनाव चिन्ह हटाने के लिए हम आजादी की दुसरी लडाई के लिए संघटित होते है।

भारत माता की जय। वंदे मातरम्।

भवदीय,


कि. बा. तथा अन्ना हजारे

Wednesday, 23 September 2015

आजादी की दुसरी लडाई की आवश्यकता...

लाखो लोगों के बलिदान के बावजूद देश में सही आजादी ना आने के कारण
आजादी की दुसरी लडाई लडनी होगी।
अंग्रेजोंका जुलुम, अन्याय, अत्याचार, सहन करने की देश के जनता की सहनशिलता खत्म होने के कारण जुलमी अंग्रेजों को इस देश से निकालने के लिए और जनता का, जनताने, जन सहभाग से चलाया तंत्र जनतंत्र (लोकतंत्र) देश में लाने के लिए देश की जनता ने 1857 से आजादी की लडाई शुरु की थी। इस लडाई में शहीद भगतसिंग, राजगुरु, सुखदेव जैसे लाखो शहीदोंने बलीदान किया। कई लोगों को सशक्त कारावास की सजा भुगतनी पडी। कई लोगों को भूमीगत रहकर अनंत हाल अपेष्ठा सहन करनी पडी। नब्बे साल की प्रदीर्घ लडाई के बाद अंग्रेज को इस देश से जाना पडा और हमारा देश आजाद हुआ।
      1947 साल में अंग्रेज देश से चला गया। हमे आजादी मिली लेकिन जनता का, जनताने, जन सहभाग से चलाया जनतंत्र (लोकतंत्र) देश में आया नही। पक्ष और पार्टीतंत्र ने जनतंत्र को देश में आने नही दिया। लोकतंत्र न आने के कारण आजादी के 68 साल में वही भ्रष्टाचार, वही गुंडागर्दी, वही लुट, वही दहशतावाद दिखाई दे रहा है। प्रश्न खडा है कि, अंग्रेज इस देश से जा कर क्या हुआ? सिर्फ गोरे लोग इस देश से गए और काले लोग आ गए।
      पक्ष और पार्टीतंत्र ने देश मे जनतंत्र को आने ही नही दिया। 1949 में भारतरत्न आदरणीय बाबासाहेब आंबेडकरजी ने हमारे देश का सुंदर संविधान बनाया। उस संविधान में पक्ष और पार्टी का नाम कही पर भी नही है। 26 जनवरी 1950 में हमारे देश में प्रजा की सत्ता आ गई। प्रजा इस देश की मालिक बन गई। जिस दिन जनता इस देश की मालिक बन गई उसी दिन सभी पक्ष और पार्टीयां बरखास्त होनी चाहिए थी। हमारा संविधान पक्ष और पार्टी को अनुमती नही देने के कारण सभी पक्ष पार्टीया बरखास्त होनी चाहिए थी। इसलिए महात्मा गांधीजीने कॉंग्रेसवालों को कहा था अब जनता देश की मालिक होने के कारण और संविधान में पक्ष और पार्टीतंत्र का नाम ना होने के कारण कॉँग्रेस पार्टी बरखास्त किजीए।
      हमारा संविधान यह कहता है कि भारत मे रहनेवाला, जो भारत का नागरिक है और जिसकी उम्र 25 साल हो गई है ऐसा वैयक्तिक चारित्र्यशिल पक्ष और पार्टी विरहीत नागरिक लोकसभा का चुनाव लड सकता है। और भारत में रहनेवाला भारत का नागरिक जिस की उम्र 30 साल कि हुई है ऐसी चारित्र्यशिल वैयक्तिक व्यक्ती जो पक्ष-पार्टी विरहीत राज्यसभा का चुनाव लड सकती है। संविधान में पक्ष और पार्टी का नाम ना होने के कारण पक्ष और पार्टीयों के समुह को चुनाव लडने की अनुमती नही है। आजादी के बाद देश में 1952 में पहिला चुनाव हो गया। इस चुनाव में संविधान के मुताबीक पक्ष और पार्टीयां बरखास्त हुई नही। संविधान ने पक्ष और पार्टीयों को चुनाव कि अनुमती ना देत हुए भी पक्ष और पार्टीयोंने घटनाबाह्य चुनाव लडे। 1952 में जब घटनाबाह्य चुनाव पक्ष और पार्टीया लड रही थी उस वक्त तत्कालीन चुनाव आयोग ने आपत्ती उठाना जरुरी था।
      चुनाव आयोग ने आपत्ती ना उठाने के कारण 1952 से ले कर आज तक पक्ष और पार्टीयां घटनाबाह्य चुनाव लड रही है। घटनाबाह्य चुनाव के कारण पक्ष-पार्टीयों में सत्ता स्पर्धा शुरु हो गई। हर पक्ष-पार्टी सोचने लगी की येन-केन प्रकार से कुछ भी करना पडे अपनी पार्टी चुनाव में चुन कर तो आना ही है और सत्ता काबीज करनी है। चुनाव लडने वाला उम्मीदवार गुंडा है, लुटारु है, भ्रष्टाचारी है, दहशतवादी है यह पार्टी के नेता को पता है लेकिन उनके पिछे वोटोंका गठ्ठा है इसलिए ऐसे दागी लोगों को भी पक्ष और पार्टीयों के तरफ से चुनाव का तिकीट देना शुरु हो गया और संसद जैसे लोकशाही के पवित्र मंदिर में गुंडा, भ्रष्टाचारी, लुटारु, व्यभिचारी उम्मीदवार की संख्या बढती गई। संसद जैसे लोकशाही के पवित्र मंदिर मे 170 से जादा दागी लोग गए है। यह इस देश के लोकतंत्र को खतरा हैऽ
      पक्ष और पार्टी विरहित जनता के चारित्र्यशिल उम्मीदवार संसद में जाने के बजाऐ घटनाबाह्य चुनाव के कारण जो पक्ष और पार्टीयों के लोग चुनाव लड कर संसद में गए उनका संसद में समुह बन गया और बाहर समाज में भी पक्ष और पार्टी के समुह बन गए। संविधान ऐसे पक्ष और पार्टी के समुह को अनुमती नही देता है। संविधान भारत का वैयक्तिक
चारित्र्यशिलनागरिक को सम्मती देता है। ऐसे पक्ष और पार्टी के समुह के कारण देश में दहशतवाद निर्माण हो गया, समुह के कारण गुंडागर्दी बढ गई है, समुह के कारण भ्रष्टाचार बढते गया है, समुह के कारण देश में हमारे देश मे जॉंती-पॉंती, धर्म, वंश के भेद निर्माण हो कर आपस में झगडे निर्माण हो गए है।
      महात्मा गांधीजी कहते थे कि, देश का सर्वांगिण विकास करना है तो गांव का सर्वांग़िण विकास होना जरुरी है। देश का हर गांव बदल गया तो देश अपने आप बदल जाएगा। लेकिन पक्ष और पार्टीयों के समुहने गांव-गांव में पक्ष और पार्टी के ग्रुप बना दिए उस कारण आज हर गांव में पक्ष और पार्टीयों के ग्रुप बन गए। झगडे तंटे बढ गए और गांव का विकास रुक गया।
      चुनाव में पैसे की जरुरत पडती है इसलिए पक्ष और पार्टीयोंने इकठ्ठा हो कर सुझाव लिया है कि अपने पार्टी को चुनाव के लिए कोई भी (20,000) बीस हजार रुपए तक डोनेशन देता है उसका हिसाब देने की जरुरत नही है। आज कई पक्ष और पार्टीयॉं लाखों रुपयों का डोनेशन लेते है उस के बीस हजार रुपयों के तुकडे करते है क्योंकी इसका हिसाब नही देना पडता। ऐसे तुकडो को बोगस नाम देते है और हमारे देश का करोडो रुपयों का कालाधान पक्ष और पार्टीयों के माध्यम से सफेद होता है। पक्ष और पार्टीयों को मिलनेवाले पैसों के एक-एक रुपयों का हिसाब देना जरुरी है। इनका स्पेशल ऑडिट होना जरुरी है। लेकिन ऑडिट होता नहीं। हमारे देश में टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाला, बोफोर्स घोटाला, हॅलिकॉप्टर घोटाला, कोयला घोटाला, व्यापम घोटाला जैसे करोडो रुपयों के घोटाले होते है। अधिकांश पक्ष और पार्टीयों के समुह के माध्यम से होते है।
      संविधान के मुताबीक पक्ष और पार्टी विरहीत भारत का वैयक्तिक चारित्र्यशिल जनता के चुने हुए उम्मीदवार संसद में जाते तो यह करोडो रुपयों के घोटाले नही होने थे। घटनाबाह्य समुह के कारण यह घोटाले हुए है।
      देश में जनता का जनताने जन सहभाग से चलाया जनतंत्र लाने के लिए 2011 से हम लोग लोकशिक्षा, लोकजागृती का काम कर रहे है। 2012-13 में पंजाब, राजस्थान, हरियाणा, उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश में पांच महिनों में तीन हजार किलोमीटर सफर कर के तिनसौ सभाऐं ली। चुनाव आयोग के साथ चार बार बैठक हुई। चुनाव आयोग से भी पुछा संविधान में पक्ष और पार्टी का नाम ना होते हुए आप पक्ष और पार्टीयों को चुनाव की अनुमती कैसे देते हो। संविधान के मुताबीक जनता का चारित्र्य्शिल उम्मीदवार अथवा वैयक्तिक चारित्र्यशिल उम्मीदवार को ही मान्यता होनी चाहिए।
      चुनाव आयोग नें हमारे उत्तरप्रदेश के लोकतंत्र मुक्ती आंदोलन के कार्यकर्ताओं को बुलाकर चर्चा की और देश में पहिली बार निर्णय लिया है कि चुनाव में उम्मीदवारों के फोटो होंगे। सिर्फ नाम और चिन्ह नहीं। लेकिन फोटो के सामने चुनाव आयोग ने पार्टी के चिन्ह भी रखे है इसलिए हमने 18 सितंबर 2015 को चुनाव आयोग से पत्र लिखा है कि संविधान के मुताबीक पक्ष और पार्टी के उम्मीदवारों के सामने पार्टी का चिन्ह है उनको निकालन जरुरी है। क्योंकि वह संविधान विरोधी है। पक्ष और पार्टी के चिन्ह निकालने से संविधान के मुताबीक सिर्फ जनता के उम्मीदवारोंके फोटो रहेंगे। और मतदाता उन फोटो को देखकर चारित्र्यशिल उम्मीदवार को ही अपना वोट देंगे (बटन दबायेंगे)।
      देश के जिन नागरिकों को लगता है की 1857 से 1947 तक इन नब्बे साल में अंग्रेज को देश से निकालने के लिए और जनताका जनताने जन सहभाग से चलनेवाला जनतंत्र देश में लाने के लिए लाखो लोगोंने बलिदान किया। उनका सपना पुरा करने के लिए देश में जनतंत्र लाना है। इन विचारों के समविचारी लोगोंने संगठित हो कर आजादी की दुसरी लडाई लडनी होगी। आजादी की पहली लडाई लडने के लिए नब्बे साल लगे। अब इतना समय नही लगेगा। पहले जो बलिदान हुआ वैसे बलिदान की जरुरत नहीं सिर्फ संगठित हो कर धरना, मोर्चा, अनशन, जेलभरो ऐसी लडाई लडनी होगी। देश में गांव-गांव के जनता को जगाना होगा। संगठित करना होगा। बडी संख्या में इस लडाई में शामिल होना है।
जय हिंद। भारत माता कि जय।
भवदीय,

कि. बा. तथा अण्णा हजारे

स्वातंत्र्याच्या दुसऱ्या लढाईची गरज...

लाखो लोकांच्या बलिदानानंतरही देशात खरे स्वातंत्र्य आले नाही. 
त्यासाठी स्वातंत्र्यासाठी दुसरी लढाई लढावी लागणार...

इंग्रजांचा जुलुम, अन्याय, अत्याचार सहन करण्याची देशातील जनतेची सहनशिलता संपल्यामुळे जुलमी इंग्रजांना देशातून घालविण्यासाठी आणि देशात लोकांची, लोकांनी, लोक सहभागातून चालविलेली लोकशाही येण्यासाठी 1857 पासून इंग्रजांना घालविण्यासाठी देशातील जनतेने स्वातंत्र्याचे युद्ध सुरु केले. नव्वद वर्षाच्या प्रदीर्घ लढाई नंतर 1947 साली इंग्रजांना आपल्या देशातून जाव लागल. त्यासाठी शहिद भगतसिंग, सुखदेव, राजगुरू सारख्या लाखो लोकांनी आपल्या प्राणाच बलिदान केले. अनेकांनी सशक्त कारावास भोगले, भूमीगत राहून अनंत हाल अपेष्ठा सहन केल्या. तेव्हा कुठे आपल्या देशाला स्वातंत्र्य मिळाले.
1947 साली इंग्रज या देशातून गेला मात्र लोकांची लोकांनी लोक सहभागातून चालविलेली लोकशाही यायला हवी होती ती लोकशाही मात्र स्वातंत्र्याच्या 68 वर्षानंतर ही देशात आली नाही. तोच भ्रष्टाचार, तिच लुट, तोच दहशतवाद, तिच गुंडगिरी घडल काय इंग्रज जाऊन? फक्त गोरे गेले आणि काळे आले एवढाच फरक दिसतो आहे. पक्ष आणि पार्टीशाहीनी लोकशाहीला देशात येऊच दिले नाही. 1949 साली भारतरत्न आदरणीय बाबासाहेब आंबेडकरांनी देशाची सुंदर घटना तयार केली. त्या घटनेमध्ये पक्ष आणि पार्ट्याचे नाव कुठेच नाही. 26 जानेवारी 1950 साली आमच्या देशात प्रजासत्ताक आले. प्रजा या देशाची मालक झाली . ज्या दिवशी जनता या देशाची मालक झाली त्याच दिवशी तत्कालीन चालत आलेल्या घटनाबाह्य पक्ष आणि पार्ट्या बरखास्त व्हायला हव्या होत्या. महात्मा गांधीजींनी कॉँग्रेस वाल्यांना सांगितले होते देशात प्रजासत्ताक आले, जनता देशाची मालक झाली. आता कॉंग्रेस पार्टी बरखास्त करा. कारण आमच्या घटनेमध्ये पक्ष आणि पार्ट्यांचे नाव कुठेही आलेले नाही.
आमची घटना असं म्हटते आहे कि भारतामध्ये राहणारा कोणीही भारताचा नागरिक ज्याचे वय 25 वर्षे आहे असा चारित्र्यशिल वैयक्तीक माणूस लोकसभेची निवडणूक लढवू शकेल आणि ज्यांच वय 30 वर्षे झाले आहे असा माणूस वैयक्तिक राज्यसभेची निवडणूक लढवू शकेल. घटनेमध्ये पक्ष आणि पार्ट्यांचे नाव नसल्याने पक्ष आणि पाट्यार्ंंच्या समुहाला घटनेप्रमाणे निवडणूक लढविता येत नाही.
स्वातंत्र्यानंतर देशात 1952 साली पहिलीच निवडणूक झाली त्या वेळी पक्ष आणि पार्ट्या बरखास्त झाल्याच नाहीत या उलट पक्ष आणि पाट्यार्ंनी पक्ष आणि पार्ट्यांना घटना मान्यता देत नसताना घटनाबाह्य निवडणूका लढविल्या. वास्तविक पाहता तत्कालीन निवडणूक आयोगाने या निवडणूकांवर आक्षेप घ्यायला हवे होते. ते त्यांनी न घेतल्यामूळे 1952 पासून आजतागायत पक्ष आणि पार्ट्यांंच्या घटनाबाह्य निवडणूका चालू आहेत.
      पक्ष आणि पार्ट्यांच्या निवडणुकामुळे पक्ष-पार्ट्यांमधे सत्ता स्पर्धा वाढत गेल्या. सत्तास्पर्धामुळे आपला पक्ष येन-केन प्रकारे निवडून यावा आणि सत्ता आपल्या हाती असावी यासाठी उमेदवार गुंड आहे, भ्रष्टाचारी आहे, लुटारु आहे, दहशतवादी आहे हे पार्टीच्या लोकांना माहित असतानाही त्यांच्या मागे फक्त मतांचा गठ्ठा आहे म्हणून त्यांना निवडणूकीचे तिकीट देणे सुरु झाले आणि संसदेसारख्या एका पवित्र मंदिरामध्ये हळुहळु गुंड, भ्रष्टाचारी, लुटारु, दहशतवादींची संख्या वाढत गेली. आज लोकसभेसारख्या पवित्र मंदीरामध्ये 170 पेक्षा अधिक लोक दागी गेले आहेत हा लोकशाहीला गंभीर धोका आहे.
      पक्ष आणि पार्टी विरहीत चारित्र्यशिल वैयक्तिक उमेदवार संसदेमध्ये जाण्याऐेवजी पक्ष आणि पार्ट्यांचे समुह संसदेसारख्या पवित्र मंदिरात गेल्याने पार्ट्यांचे संसदेत ही समुह झाले आणि बाहेर समाज्यामध्ये ही समुह तयार झाले. पक्ष-पार्टी विरहीत जनतेने आपले प्रतिनिधी निवडून लोकसभेत गेले असते तर ती खर्‍या अर्थाने लोकांची सभा झाली असती. मात्र पक्ष-पार्ट्यांचे लोक लोकसभेत गेल्यामूळे ती लोकसभा न रहाता पार्ट्यांची सभा झाली.
      स्वातंत्र्यानंतर अशा पक्ष आणि पार्ट्यांच्या समुहामुळे देशात भ्रष्टाचार वाढत गेला. पक्ष आणि पार्ट्यांच्या समुहामुळे देशात जाती-पाती, धर्म, वंशभेद निर्माण होऊन आप-आपसात भांडण-तंटे निर्माण झाले. महात्मा गांधीजीं म्हणत होते देशाचा खर्‍या अर्थाने सर्वांगिण विकास करण्यासाठी खेड्यांचा विकास होणे आवश्यक आहे. खेड्यांचा विकास झाल्याशिवाय देशाचा खर्‍या अर्थाने विकास होणार नाही. आज देशातील अधिकांश खेड्यांमध्ये पक्ष आणि पार्ट्यांच्या समुहाने आप- आपले गट-तट निर्माण केले त्यामुळे खेड्याच्या विकासाला खिळ बसली. पर्यायाने देशातील विकासाला खिळ बसली.
      आपल्या पक्षाला निवडणूकीमध्ये पैशांची गरज असते म्हणून पक्ष आणि पार्ट्यांनी एकत्र येऊन निर्णय घेतला आहे की विस हजार (20,000/-) रुपये पर्यंत ज्या देणग्या पार्टीला मिळतात त्याचा हिशेब देण्याची गरज नाही. आज लाखो रुपयांचे डोनेशन काही पार्ट्या घेतात त्याचे विस हजाराचे तुकडे करतात आणि बिगर हिशेबी मिळणारा देणग्यांचा काळा पैसा आपल्याच देशात काही पक्ष आणि पार्ट्या पांढरा करण्याचे काम करतात. पक्ष आणि पार्ट्यांना मिळणार्‍या देणगीच्या एक-एक रुपयाचा हिशेब पक्ष आणि पार्टींनी द्यायला हवा. त्यांचे स्पेशल ऑडिट व्हायला हवे मात्र ते होत नाही.
      आपल्या देशात टू जी स्पेक्ट्रम, बोफोर्स, हॅलिकॉप्टर, कोळसा, व्यापम सारखे कोट्यावधी रुपयांचे घोटाळे होतात हे पक्ष आणि पार्ट्यांच्या समुहामुळे होतात. घटनेप्रमाणे पक्ष आणि पार्टी विरहित वैयक्तिक जनतेचा उमेदवार निवडून गेला असता तर हे करोडो रुपयांचे घोटाळे झाले नसते. भ्रष्टाचार, गुंडगिरी, लुट वाटली नसती. त्यासाठी 2011 पासून आम्ही लोकशिक्षण लोकजागृती करण्याचा प्रयत्न करीत आहे. 2012, 2013 मध्ये पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश अशा सहा राज्यात पांच महिने दौरे केले. तीन हजार (3000) किलोमीटर प्रवास करुन पाच महिन्यात तिनशे सभा घेतल्या. या देशात लोकशाही आणायची असेल तर जो पर्यंत पक्ष आणि पार्टीतंत्र नेस्तनाबुत होणार नाही तो पर्यंत देशात लोकशाही येणार नाही. याचा प्रचार प्रसार केला. याला जनतेचा चांगला प्रतिसाद मिळाला. जनतेला ही बाब पटते आहे. देशाचे निवडणूक आयोगा बरोबर चार वेळेला बैठका झाल्या. निवडणूक आयोगाला आमचे म्हणणे हेच होते की घटनेमध्ये पक्ष आणि पार्टींचा उल्लेख नाही मग तुम्ही पक्ष आणि पार्ट्यांना मान्यता देता कशी? त्या  वेळी निवडणूक आयोगाने चांगला प्रतिसाद दिला.
घटनेप्रमाणे किंवा वैयक्तिक उभा असलेला चारित्र्यशिल उमेदवार अशा जनतेच्या चारित्र्यशिल उमेदवारालाच आयोगाने मान्यता द्यायला हवी. पक्ष आणि पार्टीच्या उमेदवाराला नव्हे. ही बाब निवडणूक आयोगाच्या निदर्शनाला आणून देण्याचा प्रयत्न केला. या लढाईसाठी उत्तर प्रदेश मध्ये लोकतंत्र मुक्ती आंदोलन नावाने एक आंदोलन उभे झाले आहे. मध्यप्रदेश, उत्तराखंड मध्ये मोठ्‌या प्रमाणावर कार्यकर्ते या आंदोलनात सहभागी झाले आहेत. गेल्या काही वर्षाच्या या आंदोलनाला आज पन्नास टक्के यश मिळाले आहे.
लोकतंत्र मुक्ती आंदोलनाच्या आमच्या कार्यकर्त्यांशी चर्चा करुन भारत सरकारच्या निवडणूक आयोगाने स्वातंत्र्यानंतर पहिल्यांदाच एक चांगाल निर्णय घेतला आहे. यापुढे निवडणूकांमध्ये फक्त पक्ष आणि पार्ट्यांचे चिन्ह न वापरता उमेदवारांचे फोटो वापरण्याचे आदेश निवडणूक आयोगाने दिले आहेत. म्हणजेच उमेदवाराचे फोटो हे जनतेचे उमेदवार आहेत. मात्र सदर फोटोच्या पुढे निवडणूक आयोगाने उमेदवाराचे चिन्ह ही दिले आहे. दिनांक 18 सप्टेंबर 2015 रोजी आम्ही निवडणूक आयोगाला पत्र दिले आहे कि घटना पक्ष आणि पार्टीला मानत नाही तर उमेदवाराच्या फोटोच्या समोर जे घटनाबाह्य पार्टीचे चिन्ह दिले आहे ते चिन्ह काढून टाका. उमेदवाराच्या फोटो समोरचे पक्ष आणि पार्ट्यांचे चिन्ह काढून टाकल्यास मतदारांच्या समोर जे उमेदवाराचे फोटो असेल ते सर्व घटनेप्रमाणे जनतेचे उमेदवाराचे फोटो असतील.
आता येणार्‍या निवडणूकामध्ये मतदार उमेदवारांच्या फोटो मधील फक्त चारित्र्यशिल माणसांच्या फोटोसमोरचे बटन दाबतील किंवा शिक्का मारतील. यामुळे घटनाबाह्य पक्ष आणि पार्ट्यांचे चिन्ह असणार नाही. त्यामुळे फोटो मधील दिसणार्‍या चारित्र्यशिल उमेदवाराला पाहून मतदार जनतेने उभा केलेला किंवा वैयक्तिक उभा असलेल्या उमेदवाराला मतदान करतील आणि जस-जसी लोकजागृती होईल तशी पक्ष आणि पार्टीतंत्र नेस्तनाबुत होत जाईल व एक दिवस मतदार आपल्या देशात घटनाबाह्य पक्ष आणि पार्टीतंत्र नेस्तनाबुत करुन लोकंाची, लोकांनी, लोकसहभागातुन चालविलेली लोकशाही आणू शकतील. घटनाबाह्य पक्ष आणि पार्ट्यांचे चिन्ह निवडणूक आयोगाने उमेदवारांच्या फोटो समोरुन न काढल्यास स्वातंत्र्याची दुसरी लढाई समजून जनतेला अहिंसेच्या मार्गाने लढाई लढावी लागणार आहे.
      ज्यांना वाटत कि 1857 ते 1947 या नव्वद वर्षात देशात लोकशाही यावी म्हणून लाखो शहिदांनी बलिदान केले त्या शहिदांचे स्वप्न पुर्ण करण्यासाठी आता फक्त गरज आहे या देशात लोकशाही यावी अशा समविचारी माणसांनी एकत्र येण्याची. स्वातंत्र्याच्या 68 वर्षात लोकशाहीला पक्ष आणि पार्टीतंत्रांनी आपल्या देशात येऊच दिले नाही. ती लोकशाही येण्याचा मार्ग आपल्या घटनेप्रमाणे निवडणूक आयोगाने जनतेच्या दबावामुळे काही प्रमाणात आपणाला मोकळा करुन दिला आहे. आता गरज आहे देशातील समविचारी माणसांनी एकत्र येण्याची. कारण ही स्वातंत्र्याची दुसरी लढाई आहे.
पहिल्या स्वातंत्र्याच्या लढाईला 1857 ते 1947 नव्वद वर्षे लागले. लाखो लोकांना बलिदान कराव लागले. या लढाईला एवढी वर्षे लागणार नाही पण किमान 10 ते 12 वर्षे लागतील. मात्र कोणालाही बलिदान करण्याची वेळ येणार नाही. मात्र धरणे, मोर्चे, उपोषण, जेलभरो अशी आंदोलने करावी लागतील. गावां-गावांत जनतेला जागृत करावे लागेल. स्वातंत्र्याच्या या दुसर्‍या लढाईमध्ये मोठ्या संख्येने सामील व्हायला हवे।
जय हिंद। भारत माता की जय।

आपला,


कि. बा. तथा अण्णा हजारे